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सब प्राणियों में परमात्मा को स्थित मानते हुए निष्काम सेवा करना ही परमात्मा की सच्ची उपासना है- स्वामी श्री प्रज्ञानानंद जी महाराज
January 30, 2020 • Dr. Surendra Sharma


29/1 /2020 दिन बुधवार धनोरा से श्रीमद् भागवत कथा आचार्य श्री प्रज्ञानानंद जी महाराज जी ने विस्तृत रूप से बताया कि जीवन का उद्देश्य है - प्राणी मात्र की सेवा करना । अहंकार को त्याग कर प्राणी मात्र की सेवा से जीवन अर्पण करने वाला गृहस्थ भी संत समान है। यदि मोक्ष की प्राप्ति करनी है तो मोह माया से दूर हटकर भगवान की भक्ति में ध्यान लगाना होगा। परमात्मा से सच्चे हृदय से जो प्रीति रखते हैं उन्हें सृष्टि के प्रत्येक प्राणी में उन्हीं की छाया दिखाई देती है। क्या ऊँचा क्या नीचा! सारा संसार उन्हीं से तो ओत-प्रोत हो रहा है। छोटे-बड़े, ऊँचे-नीचे का भेदभाव परमात्मा के प्रति अन्याय है। सर्वत्र व्यापी प्रभु को समदर्शी पुरुष ही जान पाते हैं । जो प्राणी मात्र को प्रेम की दृष्टि से देखता है, वही ईश्वर का प्यारा है।

अपनी पत्नी-बच्चों, रिश्तेदारों तक ही प्रेम को प्रतिबन्धित रखना स्वार्थ है। प्रेम का क्षेत्र असीम है, अनन्त है। उसे प्राणी मात्र के हृदय में देखना ही ईश्वर निष्ठा का प्रमाण है । पारमार्थिक सेवा का स्वरूप काम-भाव तथा अहंकार के विग्रह से मुक्त होना है। वहाँ केवल अपनी योग्यता का लाभ दूसरों को देना रह जाता है। सेवा और भक्ति वस्तुतः दो वस्तुयें नहीं हैं, वे एक-दूसरे के पूरक हैं, एक-दूसरे पर आश्रित हैं। प्रेम जब मन और वाणी से उतर कर आता है, तो उसे सेवा रूप में देखा जाता है। सच्चा प्रेम वह है, जो केवल शब्दों से ही मधुरता न टपकाता रहे, वरन् अपने प्रेमी के दुःख-दर्द में कुछ हाथ भी बटाये । कर्त्तव्य पालन में कष्ट स्वाभाविक है। कष्ट को अपेक्षित करके भी जो कर्त्तव्य पालन कर सकता हो, सच्ची सेवा का पुण्यफल उसे ही प्राप्त होता है। माता अपने बेटे के लिए कितना कष्ट सहती है, पर बदले में कभी कुछ चाहती नहीं। यही सेवा का सच्चा स्वरूप है। इसमें देना ही देना है, पाना कुछ नहीं है। अतः जो अपना सब कुछ न्यौछावर कर सकते हों, उन्हीं को तो परमात्मा का सान्निध्य सुख प्राप्त करने का सौभाग्य मिलता है पूज्य "आचार्यश्री" जी ने कहा - प्राणी मात्र की सेवा करना ही विराट ब्रह्म की आराधना है। प्राणी मात्र की सेवा करना मनुष्य का परम कर्त्तव्य है। इसे ही विराट ब्रह्म की आराधना कहते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है - "ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्व भूत हिते रता: ..."। अर्थात्, जो सब जीवों का हित-चिंतन करते हैं, वे मुझे प्राप्त होते हैं। अत: साधक के लिए तो यह और भी आवश्यक हो जाता है कि वह लोक-आराधक बनें, सेवाभावी बनें। विभिन्न दुर्गुणों का त्याग करने पर ही सेवाव्रत का पालन किया जा सकता है। स्वार्थ को छोड़े बिना सेवा का कार्य नहीं हो सकता। जिन्हें अपने इन्द्रिय सुखों की चिंता रहती है, वे व्यक्ति सेवा-कार्य में कभी भी सफल नहीं हो सकते। सेवाव्रती का हृदय करुणा और दया से ओत-प्रोत होता है। वह विषयों के प्रति आसक्त नहीं रहता। वह सब भोगों से निवृत्त रहता है। त्याग के कारण उसमें गुण-ग्राहयता बढ़ती जाती है। दीन-दु:खियों की सेवा, निर्बलों की रक्षा और रोगियों की सहायता ही सेवा का मुख्य लक्ष्य है। सेवाव्रती साधक किसी की हानि नहीं करता, किसी का निरादर नहीं करता। वह निरभिमानी, विनयी और त्यागी होता है। उसका अंत:करण पवित्र होने से मन की चंचलता भी नष्ट हो जाती है। मन शुद्ध हो तो अपने-पराये में भेद नहीं रहता। जब वस्तुओं का लोभ नष्ट हो जाता है, तब सत् को अपनाना और शुद्ध संकल्पों में लीन रहना साधक के अभ्यास में आ जाता है। उसमें कर्त्तव्य परायणता का उदय होता है और विषमता मिट जाती है। भेदभाव दूर होकर परम तत्व के अस्तित्व का बोध होता है। अहं का शोधन होने पर मान-अपमान की चिंता नहीं रहती, असत्य से मोह मिट जाता है। अनित्य वस्तुओं के प्रति विरक्ति उत्पन्न हो जाती है और राग-द्वेष, तेरा-मेरा का झंझट समाप्त हो जाता है। जीवन में निर्विकल्पता का आविर्भाव हो जाता है। सेवा द्वारा सुखों के उपभोग की आसक्ति समाप्त हो जाती है। अत: सब प्राणियों में परमात्मा को स्थित मानते हुए निष्काम सेवा करना ही परमात्मा की सच्ची उपासना है। सच्ची सेवा वह है जो संसार के आसक्ति पूर्ण संबंधों को समाप्त कर देती है। इसलिए केवल किसी को अपना मानकर सेवा न करें, बल्कि सेवा को कर्त्तव्य मानकर सभी की सेवा करें; क्योंकि परमात्मा के अंशभूत होने के नाते सभी प्राणियों को अपना समझना ही सद्बुद्धि है,महापुरुषों के चरित्र से चरित्र निर्माण होना चाहिए,चलचित्र से नहीं। झूठे किरदार झूठे ही होते हैं, हम रुपहले परदे में पैसा देकर झूठ को देखने जाते हैं, जहां पर ऊपरी सौंदर्य पर ध्यान दिया जाता है और अंतर जगत का सुंदर वास्तविक सौंदर्य से कोसों दूर रहता है, इसलिए समाज में नैतिक मूल्यों का ह्रास हो रहा है। एवं जीवन की सुचिता एवं पवित्रता को व्यक्ति होता जा रहा है।लोगों को यह विश्वास हो जाता है,कि जमाने में झूठ ही चलता है। झूठ से ही लोग संसार में सुखी हैं, अथवा तो झूठ का आश्रय लेकर संसार में जल्दी सफलता हासिल कर सकता हूं,इस मिथ्या भ्रम के कारण व्यक्ति झूठ के दुष्परिणाम से होने वाले कष्ट एवं हानि को भूल जाता है झूठ और असत्य का मार्ग परिणाम में विनाशी ही होता है। जिन लोगों को यह लगता है, जमाने में झूठ चलता है उन्हें यह बात का ज्ञान होना चाहिए,कि झूठ चल भी रहा है।तेरा तो सत्य के नाम पर सत्य की सौगंध देख रही हम झूठ चलाते हैं,अर्थात सत्य का लेबल लगाकर ही हम झूठ बेच रहे।