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 क्षमा वाणी में नहीं हृदय से होनी चाहिए  - आचार्य विराग सागर महाराज      
September 2, 2020 • Dr. Surendra Sharma

 क्षमा वाणी में नहीं हृदय से होनी चाहिए  - आचार्य विराग सागर महाराज                                                                                                                                                भिंड/कोडरमा 2 सितम्बर । पर्यूषण पर्व के अंतिम दिन परम पूज्य आचार्य श्री विराग सागर जी महाराज ने बेर के कारण जब दो व्यक्तियों में परस्पर विषम बाद तनाव विरोध हो जाता है तो वह 36 की स्थिति पर ला देता है और मैत्री 36 की दिशा को बदलकर 63 यानी प्रेमभाव आनंद खुशी हर्ष भाव को उत्पन्न कर देती है मेरी भी सदैव यही भावना रहती है कि सारा संसार 63 के रूप में नजर आए जब किसी के बीच 36 की स्थिति बन जाए तो मंगल वी दंगल झगड़े में बदल जाता है ऐसे दिनों में समझना चाहिए कि अब लक्ष्मी क्षमा शांति बुद्धि श्री आदि आदि देवियों के प्रस्थान का समय आ गया है और 63 की स्थिति में व्यक्ति की ताकत धूनी हो जाती है।                                         जाने दो भी दो सौ दो हजार या दो लाख के बराबर हो जाते हैं इसी ताकत के बल पर तो राम लक्ष्मण ने शिखंडी रावण को जीता था बंधुओं धन्य हमारा जैन धर्म गौरव है कि हमारे जीवन में एक दिन ऐसा आता है कि हमें साल भर की गंदगी साफ करने का मौका मिलता है मनुष्य है तो कसाय बेर विरोध हो सकता है लेकिन उसे सदा बनाए रखना अच्छा नहीं है बुद्धिमान समझदार व्यक्ति जैसे घर के कचरे को प्रतिदिन निकालते हैं क्योंकि झाड़ू लगती रहती है तो घर साफ रहता है यदि 1 दिन भी धुले कपड़े ना पहने तो व्यक्ति बोलना तो दूर पास में बैठना भी पसंद नहीं करता यानी उसका आदर सम्मान कम हो जाता है लेकिन घर कपड़े बर्तन आदि को सफाई के साथ मन को भी साफ रखें साधु जन सदैव तीर्थंकर की वाणी का पालन करते हुए खामाम्मी सव जीवानां की प्रार्थना करते हैं अतः साधुओं की प्रतिदिन क्षमा वाणी होती है किसी ने कहा क्षमा वाणी में नहीं ह्रदय से होना चाहिए मैंने कहा वाणी रूपी सुई के बिना हृदय का काटा नहीं निकलता वाणी में क्षमा आ जाए तो निश्चित ही एक दिन हृदय में भी क्षमा आ जाएगी

मैंने प्रमाद बस दुख तुम्हें दिया हो कि कभी अनादर भी किया हो ना सल्य मान मन मैं रखता हूं मांगता ह्रदय से सबसे क्षमा में प्रतेक का सबको करता क्षमा में सारे क्षमा मुझे करें नित मांगता में मेत्री रहे जगत के प्रति नित्य मेरी हो बेर भाव किससे जब हो ना बेरी।।

बंदूऔे मेरी ऐसी भावना है कि हमारे इस क्षमा वाणी महापर्व को ऐसा सम्मान मिले कि यह धर्म सारे विश्व के प्राणी मात्र का बन जाए ओम नमः सबसे क्षमा सबको क्षमा राज कुमार अजमेरा,नवीन गंगवाल कोडरमा